शैख़ मयख़ाने से जब सू-ए-हरम आते हैं

By ishrat-jahangirpuriJanuary 3, 2024
शैख़ मयख़ाने से जब सू-ए-हरम आते हैं
सर झुकाए हुए बा-दीदा-ए-नम आते हैं
अहल-ए-गुलशन तो हज़ारों हैं मुक़द्दर से मगर
बर्क़ के सामने आते हैं तो हम आते हैं


फिर भी बे-ताबी-ए-दिल खींच के ले जाती है
गो तिरी बज़्म से हम खा के क़सम आते हैं
रास्ता ज़ीस्त का पुर-पेच नज़र आता है
जब ख़यालों में तिरी ज़ुल्फ़ के ख़म आते हैं


मुख़्लिसाना तिरे अंदाज़ नहीं हैं साक़ी
हम तिरी बज़्म में इस वास्ते कम आते हैं
वो 'अबस करते हैं महरूमी-ए-क़िस्मत का गिला
जो तिरी बज़्म में बेगाना-ए-ग़म आते हैं


दिल-ए-नाकाम को मिलता है उमीदों का पयाम
जब कभी मंज़िल-ए-मक़्सूद पे हम आते हैं
किस तरह हुस्न पे आईना हो हालत मेरी
नाला करने के तरीक़े मुझे कम आते हैं


हुस्न की ज़द से कोई दिल को बचाए क्यूँकर
उन के तीर अब तो ब-अंदाज़-ए-करम आते हैं
अपना मरकज़ ही समझ रक्खा हो जैसे 'इशरत'
यूँ मिरे दिल की तरफ़ रंज-ओ-अलम आते हैं


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