सोचा था तिरे ग़म को निभाएँगे कहाँ तक

By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
सोचा था तिरे ग़म को निभाएँगे कहाँ तक
लेकिन ये त'अल्लुक़ तो चला आया है जाँ तक
लब ख़ुश्क थे एहसान न दरिया का उठाया
जाने को कई बार गए आब-ए-रवाँ तक


याद आती नहीं ठीक से सूरत भी तुम्हारी
अफ़सोस बदल जाते हैं हालात यहाँ तक
चेहरे की बशाशत ने सभी दर्द छुपाए
इस आग से उठता भी नहीं कोई धुआँ तक


अब घर में ही रहते हैं मिरी जान के दुश्मन
इस दौर में महफ़ूज़ नहीं जा-ए-अमाँ तक
88026 viewsghazalHindi