तालिब-ए-दीद को मंज़िल-ए-'इश्क़ में कौन कहता है ये राहबर चाहिए

By ishrat-jahangirpuriJanuary 3, 2024
तालिब-ए-दीद को मंज़िल-ए-'इश्क़ में कौन कहता है ये राहबर चाहिए
उन का जल्वा हर इक शय में मौजूद है मो'तबर अपना ज़ौक़-ए-नज़र चाहिए
हम असीरों का सय्याद अरमाँ ये है बस नज़र भर के फिर आशियाँ देख लें
गो ये सच है कि परवाज़ के वास्ते कुछ न कुछ क़ुव्वत-ए-बाल-ओ-पर चाहिए


सख़्तियाँ कैसी और कैसी नाकामियाँ मंज़िल-ए-'इश्क़ में कैसी दुश्वारियाँ
कामयाबी क़दम-बोस होने लगे 'अज़्म-ए-मोहकम में इतना असर चाहिए
ऐ नसीम-ए-सहर ऐसा धोका न दे आमद-ए-फ़स्ल-ए-गुल का सहारा न दे
रुत न बदले कि बदले हमें क्या ग़रज़ हम को आने की उन के ख़बर चाहिए


मैं जगह की परस्तिश तो करता नहीं इक तसव्वुर के आगे झुकाता हूँ सर
नासेहा मुझ को समझाना बेकार है और होंगे जिन्हें संग-ए-दर चाहिए
दास्तानें सुनाने से क्या फ़ाएदा राज़-ए-उल्फ़त बताने से क्या फ़ाएदा
‘इश्क़-ए-ख़ुद्दार ये मशवरा है मिरा हुस्न से गुफ़्तुगू मुख़्तसर चाहिए


राह-ए-उल्फ़त में रक्खा है पहला क़दम और ज़िद है कि पूछेंगे हालात-ए-ग़म
कीजिए जान-ए-'इशरत' न क़ासिर हमें राज़-दाँ 'इश्क़ का मो'तबर चाहिए
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