त'अल्लुक़ात की ये रौशनी है कितनी देर

By wasim-nadirJanuary 5, 2024
त'अल्लुक़ात की ये रौशनी है कितनी देर
तिरे लबों पे मिरी शा'इरी है कितनी देर
वही मलाल का सूरज वही गली कूचा
ऐ ख़्वाब-ए-यार तिरी ज़िंदगी है कितनी देर


तुझे भी ख़्वाहिशें तेरी तबाह कर देंगी
ऐ हुस्न-ए-यार तिरी सादगी है कितनी देर
बुझे पड़े हैं तिरे शहर में कई सूरज
मैं जानता हूँ ये ज़िंदा-दिली है कितनी देर


तिरे ख़तों पे नज़र पड़ती है तो सोचता हूँ
मिरी निगाह में ये रौशनी है कितनी देर
अब इस के बा'द वही दश्त है वही सहरा
तुम्हारी आँख में 'नादिर' नमी है कितनी देर


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