तपिश क्यों बढ़ रही है रास्तों की
By chand-kakralviJanuary 19, 2024
तपिश क्यों बढ़ रही है रास्तों की
क़ज़ा आने को है क्या आबलों की
हमारे हाथ हीरा हो गए हैं
घिसाई करते करते पत्थरों की
हवा के साथ चलना पड़ रहा है
बड़ी मजबूरियाँ हैं बादलों की
जहाँ तक साथ ले जाएँ हवाएँ
वहीं तक ज़िंदगी है ख़ुशबुओं की
यक़ीनन फूल कोई खिल गया है
नहीं तो भीड़ क्यों है तितलियों की
उसी के सामने रोऊँगा जा कर
जो क़ीमत जानता है आँसुओं की
हटा कर 'चाँद' ने चेहरे से पर्दा
ज़बानें काट दीं तारीकियों की
क़ज़ा आने को है क्या आबलों की
हमारे हाथ हीरा हो गए हैं
घिसाई करते करते पत्थरों की
हवा के साथ चलना पड़ रहा है
बड़ी मजबूरियाँ हैं बादलों की
जहाँ तक साथ ले जाएँ हवाएँ
वहीं तक ज़िंदगी है ख़ुशबुओं की
यक़ीनन फूल कोई खिल गया है
नहीं तो भीड़ क्यों है तितलियों की
उसी के सामने रोऊँगा जा कर
जो क़ीमत जानता है आँसुओं की
हटा कर 'चाँद' ने चेहरे से पर्दा
ज़बानें काट दीं तारीकियों की
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