तक़दीर बदलनी ना-मुम्किन बंदे से ख़ुदाई क्या होगी

By bartar-madrasiJanuary 2, 2024
तक़दीर बदलनी ना-मुम्किन बंदे से ख़ुदाई क्या होगी
जैसी है गुज़रनी गुज़रेगी दुश्मन से बुराई क्या होगी
जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आई थी ख़ुशियों में परिंदे गाते थे
गुलशन में ख़िज़ाँ का 'आलम है अब नग़्मा-सराई क्या होगी


बे-‘अक़्ल हैं वो नादान हैं वो जो आस लगाए बैठे हैं
जब ख़ुद न सुधारें हाल अपना औरों से भलाई क्या होगी
रुक जाते हैं दिल ही दिल में मिरे क्या ख़ाक बुलंदी पर पहुँचें
नाले न ज़बाँ तक आते हैं ता-‘अर्श रसाई क्या होगी


मेहनत से बचाते हैं दामन पीरी पे उतर आए हैं शैख़
आसान कमाई हाथ लगी दुश्वार कमाई क्या होगी
बचने की नहीं सूरत ऐ दिल बेकार हैं तेरी तदबीरें
नज़रों से तहफ़्फ़ुज़ क्या होगा ज़ुल्फ़ों से रिहाई क्या होगी


क्या ख़ूब निभाई शर्त-ए-वफ़ा 'बरतर' को अकेला छोड़ गए
रू-पोश हुए हो ज़ेर-ए-लहद अब जल्वा-नुमाई क्या होगी
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