तशफ़्फ़ी-बख़्श है ख़ुद बे-क़रारी बे-क़रारों की

By sarahat-ahmad-sarahatJanuary 4, 2024
तशफ़्फ़ी-बख़्श है ख़ुद बे-क़रारी बे-क़रारों की
मोहब्बत की 'अता है हर मसर्रत ग़म के मारों की
नशात-ए-ज़िंदगी इंसाँ की गर बे-लुत्फ़ हो जाए
अगर खुल जाए दुनिया पर हक़ीक़त ग़म के मारों की


रवाबित भी बराबर काम करते हैं सहारों का
किनारों तक हमें ले जाएगी निस्बत किनारों की
ख़िताब-ए-बे-सदा कहते हैं उन के हर इशारे को
कई तफ़्सीरें हो सकती हैं अब उन के इशारों की


गुलों से ख़ार भी लिपटे हुए रहते हैं गुलशन में
ख़िज़ाँ की परवरिश होती है दामन में बहारों की
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