तश्बीह रम्ज़ रस न किनाए के बस में है

By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
तश्बीह रम्ज़ रस न किनाए के बस में है
वो हुस्न-ए-बे-मिसाल मिरी दस्तरस में है
ऐसा नहीं कि सिर्फ़ हमी हैं थकन से चूर
बरसों की इक थकान सदा-ए-जरस में है


अहवाल मेरे शोर-ए-सलासिल के सुन रफ़ीक़
जैसे रवाँ-दवाँ कोई दरिया क़फ़स में है
ऐ चारागर इलाज-ए-ग़म-ए-दिल फ़क़त नहीं
वहशत का इक जहान तिरे बुल-हवस में है


वैसे तो हो चुकी है मुकम्मल मिरी ग़ज़ल
इक मतला'-ए-'उरूज मगर पेश-ओ-पस में है
59973 viewsghazalHindi