तस्लीम कर रहा हूँ कि तेरा रक़ीब हूँ
By wasim-nadirJanuary 5, 2024
तस्लीम कर रहा हूँ कि तेरा रक़ीब हूँ
तू सोचता तो होगा मैं कितना 'अजीब हूँ
एहसान कर रहा है तिरा हिज्र इन दिनों
मैं इन दिनों ख़ुदा के ज़ियादा क़रीब हूँ
मुझ को तुम्हारे 'इश्क़ ने दी हैं तसल्लियाँ
कुछ लोग कह रहे थे मैं कितना ग़रीब हूँ
अफ़्साना मुझ से कोई मुकम्मल न हो सका
तू जानता नहीं मैं अधूरा अदीब हूँ
अपनी हथेलियों से यही पूछता हूँ मैं
कुछ तो पता चले कि मैं किस का नसीब हूँ
मुमकिन है इस के बा'द कोई शय न देख पाऊँ
मैं आज रात चाँद के बेहद क़रीब हूँ
तू सोचता तो होगा मैं कितना 'अजीब हूँ
एहसान कर रहा है तिरा हिज्र इन दिनों
मैं इन दिनों ख़ुदा के ज़ियादा क़रीब हूँ
मुझ को तुम्हारे 'इश्क़ ने दी हैं तसल्लियाँ
कुछ लोग कह रहे थे मैं कितना ग़रीब हूँ
अफ़्साना मुझ से कोई मुकम्मल न हो सका
तू जानता नहीं मैं अधूरा अदीब हूँ
अपनी हथेलियों से यही पूछता हूँ मैं
कुछ तो पता चले कि मैं किस का नसीब हूँ
मुमकिन है इस के बा'द कोई शय न देख पाऊँ
मैं आज रात चाँद के बेहद क़रीब हूँ
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