तस्वीर-ए-मसर्रत है कि ग़म खोए हुए हैं
By badr-shamsiJanuary 2, 2024
तस्वीर-ए-मसर्रत है कि ग़म खोए हुए हैं
कुछ अश्क सर-ए-दीदा-ए-नम खोए हुए हैं
मिल कर भी जुदा रहना है तक़दीर-ए-मोहब्बत
वो सामने आए हैं तो हम खोए हुए हैं
हैं ज़ख़्म-ए-जिगर महव-ए-मुनाजात-ए-मोहब्बत
या ज़िक्र-ए-इलाही में सनम खोए हुए हैं
इस वक़्त न पाएगी हमें गर्दिश-ए-दौराँ
इस वक़्त तिरी याद में हम खोए हुए हैं
इन जागती आँखों में सुलगते हैं अभी तक
कुछ ख़्वाब जो ख़ुद अपना भरम खोए हुए हैं
ख़ुद से भी मुलाक़ात नहीं तुझ से बिछड़ कर
हम भी तिरी यादों की क़सम खोए हुए हैं
है कोई जो आ कर तिरे कूचे का पता दे
कुछ लोग सर-ए-दैर-ओ-हरम खोए हुए हैं
एहसास को अल्फ़ाज़ का पैकर नहीं मिलता
तहरीर की वादी में क़लम खोए हुए हैं
अब दिल में नहीं 'बद्र' कोई नक़्श-ए-तमन्ना
साए पस-ए-दीवार-ए-हरम खोए हुए हैं
कुछ अश्क सर-ए-दीदा-ए-नम खोए हुए हैं
मिल कर भी जुदा रहना है तक़दीर-ए-मोहब्बत
वो सामने आए हैं तो हम खोए हुए हैं
हैं ज़ख़्म-ए-जिगर महव-ए-मुनाजात-ए-मोहब्बत
या ज़िक्र-ए-इलाही में सनम खोए हुए हैं
इस वक़्त न पाएगी हमें गर्दिश-ए-दौराँ
इस वक़्त तिरी याद में हम खोए हुए हैं
इन जागती आँखों में सुलगते हैं अभी तक
कुछ ख़्वाब जो ख़ुद अपना भरम खोए हुए हैं
ख़ुद से भी मुलाक़ात नहीं तुझ से बिछड़ कर
हम भी तिरी यादों की क़सम खोए हुए हैं
है कोई जो आ कर तिरे कूचे का पता दे
कुछ लोग सर-ए-दैर-ओ-हरम खोए हुए हैं
एहसास को अल्फ़ाज़ का पैकर नहीं मिलता
तहरीर की वादी में क़लम खोए हुए हैं
अब दिल में नहीं 'बद्र' कोई नक़्श-ए-तमन्ना
साए पस-ए-दीवार-ए-हरम खोए हुए हैं
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