तिरे कुन का तो पैंतरा है पुराना
By ananth-faaniJanuary 2, 2024
तिरे कुन का तो पैंतरा है पुराना
नए मो'जिज़े माँगता है ज़माना
छुपा है जो हम से पता है न उस को
मोहब्बत में है जुर्म कुछ भी छुपाना
भरे तरकाशों का भरम भी बहुत है
नहीं लाज़मी तीर सारे चलाना
सफ़र है पड़ाव आते जाते रहेंगे
किसी इक ठिकाने से क्या दिल लगाना
‘अजूबा सा कुछ अंत में होगा 'फ़ानी'
वगरना तो क्या ही था सारा फ़साना
नए मो'जिज़े माँगता है ज़माना
छुपा है जो हम से पता है न उस को
मोहब्बत में है जुर्म कुछ भी छुपाना
भरे तरकाशों का भरम भी बहुत है
नहीं लाज़मी तीर सारे चलाना
सफ़र है पड़ाव आते जाते रहेंगे
किसी इक ठिकाने से क्या दिल लगाना
‘अजूबा सा कुछ अंत में होगा 'फ़ानी'
वगरना तो क्या ही था सारा फ़साना
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