तेरी ख़ूँ-रेज़ सियासत का असर लगता है

By mushtaq-darbhangwiJanuary 4, 2024
तेरी ख़ूँ-रेज़ सियासत का असर लगता है
राह चलता हूँ तो हर गाम पे डर लगता है
दश्त-दर-दश्त फिराता रहा मुझ को बरसों
दिल-ए-आवारा जो बर्बाद-ए-नज़र लगता है


वही सुर्ख़ी वही रंगत वही मानूस महक
कफ़-ए-गुल भी तो मिरा ज़ख़्म-ए-जिगर लगता है
आज भी मेरी वफ़ा-केश निगाहों में तू
ज़िंदगी का कोई रंगीन सफ़र लगता है


तेरी पलकों पे लरज़ता हुआ हर क़तरा-ए-अश्क
मिरी पुर-शौक़ निगाहों में गुहर लगता है
अब नहीं आएगा 'मुश्ताक़' वो आने वाला
बुझ गए तारे चलो वक़्त-ए-सहर लगता है


96654 viewsghazalHindi