तू अभी तक भी मुझे ख़ुद से जुदा जानता है

By hasrat-khan-khatakJanuary 3, 2024
तू अभी तक भी मुझे ख़ुद से जुदा जानता है
मैं कभी सोच नहीं सकता ख़ुदा जानता है
मुझ से बै'अत का तक़ाज़ा न तवक़्क़ो' रखना
मेरा सर नेज़े पे सजने को जज़ा जानता है


दोस्त है वो तो समझ जाएगा हाजत तेरी
दोस्त चेहरे से तिरे मन की सदा जानता है
जानता है कि मुझे 'इश्क़ है सहराओं से
वो मोहब्बत में पहाड़ों की अना जानता है


इस से बढ़ कर भी भला और वफ़ा क्या होगी
मुझ से बढ़ कर वो हर इक रस्म-ए-वफ़ा जानता है
किस क़दर दान किया उस ने मुझे आब-ए-हयात
ये तो मैं जानता या मेरा ख़ुदा जानता है


ज़ुल्फ़ खोले तो क़यामत वहीं बरपा कर दे
आँखों आँखों में वो तूफ़ान उठा जानता है
सुब्ह की पहली अज़ानों से भी पहले उठ कर
रोज़ इक राज़ वो फ़ितरत से नया जानता है


रुख़-ए-दौराँ पे पड़े पर्दे हटा दो यारो
जान जाएँगे जो कहते हैं कि क्या जानता है
वो जो हर वक़्त कहे जाता है मैं जानता हूँ
वो नहीं जानता सूरज को दिया जानता है


हुस्न-ए-पुर-नूर सुख़न-साज़ वो आज़ाद-मनश
उस का बरताव मगर शर्म-ओ-हया जानता है
मैं नहीं जानता कुछ भी मैं यही जानता हूँ
और क्या जानना ये जान के क्या जानता है


वो नुमू-ख़ेज़ बहारों में पला सुर्ख़ गुलाब
वो मिरी आँख की सुर्ख़ी को हरा जानता है
मेरे मालिक मिरा दामन नहीं रखना ख़ाली
मिरा बेटा मुझे हर तौर भरा जानता है


38638 viewsghazalHindi