उभरता चाँद लिक्खेंगे सुनहरा ख़्वाब लिक्खेंगे
By baqar-naqviJanuary 2, 2024
उभरता चाँद लिक्खेंगे सुनहरा ख़्वाब लिक्खेंगे
किताब-ए-दिल का इक दिन फिर से पहला बाब लिक्खेंगे
हया आई गर अपनी बेबसी का ज़िक्र करने से
'अलामत की ज़बाँ में माही-ए-बे-आब लिक्खेंगे
हम अपने ज़ाग़ को ताऊस कहने पर मुसिर होंगे
तो सब तालाब की चिड़ियों को भी सुरख़ाब लिक्खेंगे
हमारे ज़ेहन ज़ंग-आलूद दस्त-ओ-पा हैं नाकारा
हम अब तारीख़ ज़ेर-ए-मिम्बर-ओ-मेहराब लिक्खेंगे
कभी तारीख़ में बे-नाम रहना ही भलाई है
तुम्हारा ज़िक्र लिक्खेंगे तो फिर क़स्साब लिक्खेंगे
सुतून-ए-जिस्म पर मेरे नए ज़ख़्मों के रेशम से
मोहब्बत का तराना ख़ुद मिरे अहबाब लिक्खेंगे
किताब-ए-दिल का इक दिन फिर से पहला बाब लिक्खेंगे
हया आई गर अपनी बेबसी का ज़िक्र करने से
'अलामत की ज़बाँ में माही-ए-बे-आब लिक्खेंगे
हम अपने ज़ाग़ को ताऊस कहने पर मुसिर होंगे
तो सब तालाब की चिड़ियों को भी सुरख़ाब लिक्खेंगे
हमारे ज़ेहन ज़ंग-आलूद दस्त-ओ-पा हैं नाकारा
हम अब तारीख़ ज़ेर-ए-मिम्बर-ओ-मेहराब लिक्खेंगे
कभी तारीख़ में बे-नाम रहना ही भलाई है
तुम्हारा ज़िक्र लिक्खेंगे तो फिर क़स्साब लिक्खेंगे
सुतून-ए-जिस्म पर मेरे नए ज़ख़्मों के रेशम से
मोहब्बत का तराना ख़ुद मिरे अहबाब लिक्खेंगे
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