उदासियों का मुसलसल नुज़ूल अब भी है

By wasim-nadirJanuary 5, 2024
उदासियों का मुसलसल नुज़ूल अब भी है
हर एक चीज़ पे कमरे की धूल अब भी है
उलझ के रह गए रूमाल अपने जिस में कभी
वफ़ा की राह में क्या वो बबूल अब भी है


वो 'इश्क़ वालों को सहरा में छोड़ आते थे
तुम्हारे शहर में क्या ये उसूल अब भी है
तुम्हारे नाम की ख़ुशियाँ तो ख़ैर मिल न सकीं
तुम्हारे नाम का हर ग़म क़ुबूल अब भी है


कभी-कभार महक उठने का सबब 'नादिर'
वफ़ा की शाख़ पे इक-आध फूल अब भी है
79678 viewsghazalHindi