उड़ती हुई मिट्टी है दिल अपना कोई दिन में

By basheer-ahmad-basheerJanuary 2, 2024
उड़ती हुई मिट्टी है दिल अपना कोई दिन में
मिटने को है ये नक़्श-ए-तमन्ना कोई दिन में
कुछ रोज़ है लौ देते हुए ध्यान की गर्मी
बुझता नज़र आता है ये शो'ला कोई दिन में


ता-चंद ये तुग़्यानी-ए-सद-मौजा-ए-एहसास
है एक रग-ए-संग ये दरिया कोई दिन में
है बात कोई दिन की ये हंगामा-ए-हस्ती
ला-रैब उजड़ता है ये मेला कोई दिन में


हर क़स्र-ए-'अनासिर की है तक़दीर में गिरना
हर सूरत-ए-ज़ेबा है फ़साना कोई दिन में
हासिल है यहाँ किस को दवाम-ओ-अबदिय्तय
हर शहर है इक गोशा-ए-सहरा कोई दिन में


आएँगे न फिर लौट के ऐ यार-ए-कम-आमेज़
उठने को हैं अर्बाब-ए-तक़ाज़ा कोई दिन में
खो जाऊँगा इस दश्त की वुस'अत में कहीं मैं
ढूँडोगे मिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा कोई दिन में


पहुँचा ही समझ मुझ को नदीम-ए-'अदम-आबाद
तय होने को है मंज़िल-ए-दुनिया कोई दिन में
कुछ हाल 'बशीर' आज दिगर-गूँ सा लगा है
करता है ये दरवेश भी पर्दा कोई दिन में


97593 viewsghazalHindi