'उम्र भर पैकर-ए-एहसास में ढाले न गए
By ahmad-ayazFebruary 24, 2025
'उम्र भर पैकर-ए-एहसास में ढाले न गए
हम वो वहशी थे जो ख़ुद से भी सँभाले न गए
पत्थरों को भी कहाँ सहल था पत्थर होना
ये भी हस्सास थे जब तक की उछाले न गए
कुछ हवाओं में तपिश थी सो बदन जलने लगा
और फिर ऐसा जला जिस्म के छाले न गए
आइना-साज़ था वो ढालता था आईने
ऐसा ढाला कि मिरे 'अक्स निकाले न गए
लोग ख़ुश होते रहे देख हसीं मौजों को
हम समुंदर थे कभी दिल से खंगाले न गए
रात भर हम भी सफ़र करते रहे चाँद के साथ
दाग़ कुछ हम पे उभर आए निकाले न गए
हम वो वहशी थे जो ख़ुद से भी सँभाले न गए
पत्थरों को भी कहाँ सहल था पत्थर होना
ये भी हस्सास थे जब तक की उछाले न गए
कुछ हवाओं में तपिश थी सो बदन जलने लगा
और फिर ऐसा जला जिस्म के छाले न गए
आइना-साज़ था वो ढालता था आईने
ऐसा ढाला कि मिरे 'अक्स निकाले न गए
लोग ख़ुश होते रहे देख हसीं मौजों को
हम समुंदर थे कभी दिल से खंगाले न गए
रात भर हम भी सफ़र करते रहे चाँद के साथ
दाग़ कुछ हम पे उभर आए निकाले न गए
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