ऊँचाइयों से ख़ाक में उतरे हुए भी देख

By shahbaz-choudharyJanuary 5, 2024
ऊँचाइयों से ख़ाक में उतरे हुए भी देख
इस ज़ीस्त के सफ़र के सभी मरहले भी देख
रौज़न बुझा के मेरे न होने की दे दलील
पर्दे हटा के झाँक मुझे दिन चढ़े भी देख


इस मुख़्तसर सी राह में रख़्त-ए-सफ़र न बाँध
तुझ से जो पेशतर हुए वो क़ाफ़िले भी देख
सीने की बर्फ़ आँख के पानी का कर शुमार
होंटों पे दब के मर गए वो तज़्किरे भी देख


जो यार तेरी तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल में गुम हुईं
वो सिसकियाँ भी गिन कभी वो रतजगे भी देख
हँस हँस के तर्क-ए-'इश्क़ की न दास्ताँ सुना
अश्कों ने जो लिखे कभी वो मरसिए भी देख


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