उठती कभी कभी है कोई टीस हाए दिल
By ishrat-sagheerOctober 27, 2023
उठती कभी कभी है कोई टीस हाए दिल
माल-ओ-मता' कुछ भी नहीं थे सिवाए दिल
फिरती हैं मेरे सामने जब सूरतें कई
फिर किस को याद रक्खे किसे भूल जाए दिल
वक़्त-ए-विदा' यार तहम्मुल से काम ले
अब ख़ुद को किस तरह से यूँ पत्थर बनाए दिल
हो कुछ भी मुज़्तरिब ये मगर दिल तो है नहीं
बर्क़-ए-तपाँ है सीने में शायद बजाए-दिल
होती हैं कैसी कैसी यहाँ लाल-कारियाँ
अपना असर दिखाती है जब करबला-ए-दिल
तब्दील कर दिया है हर इक तौर 'इश्क़ ने
महफ़िल से जी चुराए तो सहरा में गाए दिल
माल-ओ-मता' कुछ भी नहीं थे सिवाए दिल
फिरती हैं मेरे सामने जब सूरतें कई
फिर किस को याद रक्खे किसे भूल जाए दिल
वक़्त-ए-विदा' यार तहम्मुल से काम ले
अब ख़ुद को किस तरह से यूँ पत्थर बनाए दिल
हो कुछ भी मुज़्तरिब ये मगर दिल तो है नहीं
बर्क़-ए-तपाँ है सीने में शायद बजाए-दिल
होती हैं कैसी कैसी यहाँ लाल-कारियाँ
अपना असर दिखाती है जब करबला-ए-दिल
तब्दील कर दिया है हर इक तौर 'इश्क़ ने
महफ़िल से जी चुराए तो सहरा में गाए दिल
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