वही बुलंदी से नीचे हमें गिराते हैं

By chand-kakralviJanuary 19, 2024
वही बुलंदी से नीचे हमें गिराते हैं
वो जिन के वास्ते हम सीढ़ियाँ बनाते हैं
बिखरने लगते हैं हम को समेटने वाले
कभी कभार तो हम इतना टूट जाते हैं


सुकून मिलता है दिल को इसी वज़ीफ़े से
हम अपने शे'र अकेले में गुनगुनाते हैं
उन्हें सनद नहीं मिलती कभी मोहब्बत में
जो सर बचाते हैं और उँगलियाँ कटाते हैं


अब और इस से ज़ियादा भी रब्त क्या होगा
वो धूप में हों पसीने में हम नहाते हैं
रसाई धूप की होती कहाँ है कमरे में
हमारे कपड़े बदन पर ही सूख जाते हैं


46839 viewsghazalHindi