वारफ़्तगी सी रहती थी शाम-ओ-सहर मुझे

By basheer-ahmad-basheerJanuary 2, 2024
वारफ़्तगी सी रहती थी शाम-ओ-सहर मुझे
याद आए क्या ज़माने तुम्हें देख कर मुझे
गुज़रा जो उस दयार से मैं मुद्दतों के बा'द
हैरत से देखने लगे दीवार-ओ-दर मुझे


इक हादिसा है रब्त-ए-दिल-ओ-जाँ के बावजूद
मेरी ख़बर है उन को न उन की ख़बर मुझे
इक दिन उठी न वो निगह-ए-ज़ीस्त-आफ़रीं
दिन आ गए ये बैठे सर-ए-रहगुज़र मुझे


कितने बदल गए हो बदलती रुतों के साथ
तुम कर के वक़्फ़-ए-मौसम-ए-चश्मान-ए-तर मुझे
ग़ुर्बत की शाम शाम-ए-लहू में डुबो गया
मिलना ब-चश्म-ए-नम तिरा शाम-ए-सफ़र मुझे


इक ध्यान था कि आया मुझे ता-सहर 'बशीर'
इक इज़्तिराब था कि रहा रात-भर मुझे
46766 viewsghazalHindi