वो 'आलम भी 'अजब इक 'आलम-ए-मजबूर होता है

By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
वो 'आलम भी 'अजब इक 'आलम-ए-मजबूर होता है
सफ़ीना ग़र्क़-ए-दरिया और साहिल दूर होता है
वही तो जल्वा-ए-बेताब बर्क़-ए-तूर होता है
जो दिल में जागुज़ीँ हो कर नज़र से दूर होता है


किया करता है दा'वा आदमी मुख़्तार होने का
मगर ये बे-ख़बर तो मुतलक़न मजबूर होता है
अनल-हक़ और ज़बाँ इक आदमी की ऐ म'आज़-अल्लाह
कहीं सब को मयस्सर मशरब-ए-मंसूर होता है


मोहब्बत में कोई उस शख़्स की बेचारगी देखे
जो ग़म में मुस्कुराने के लिए मजबूर होता है
ज़रा 'मैकश' को मयख़ाने में कोई छेड़ कर देखे
मगर उस वक़्त जब वो बे-ख़ुद-ओ-मख़्मूर होता है


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