वो अपनी जान पर ऐसा ग़ज़ब करेगा क्यों
By wasim-nadirJanuary 5, 2024
वो अपनी जान पर ऐसा ग़ज़ब करेगा क्यों
मिरे लिए भला तर्क-ए-नसब करेगा क्यों
मैं मुतमइन हूँ नहीं कुछ भी अब गँवाने को
सो मेरा क़त्ल कोई बे-सबब करेगा क्यों
उतार आया हूँ मैं झूट के लिबादे सब
मिरी तलाश तिरा शहर अब करेगा क्यों
जिसे चराग़ मिले हों जले-जलाए हुए
वो रौशनी का ज़रा भी अदब करेगा क्यों
जो मेरे साथ कभी जाग भी नहीं पाया
वो मुझ से ख़्वाबों की दौलत तलब करेगा क्यों
मिरे लिए भला तर्क-ए-नसब करेगा क्यों
मैं मुतमइन हूँ नहीं कुछ भी अब गँवाने को
सो मेरा क़त्ल कोई बे-सबब करेगा क्यों
उतार आया हूँ मैं झूट के लिबादे सब
मिरी तलाश तिरा शहर अब करेगा क्यों
जिसे चराग़ मिले हों जले-जलाए हुए
वो रौशनी का ज़रा भी अदब करेगा क्यों
जो मेरे साथ कभी जाग भी नहीं पाया
वो मुझ से ख़्वाबों की दौलत तलब करेगा क्यों
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