वो हादिसा भी हुआ मेरी ज़िंदगानी में
By anaam-damohiFebruary 5, 2024
वो हादिसा भी हुआ मेरी ज़िंदगानी में
जिसे पढ़ा था बड़े शौक़ से कहानी में
दिखाई जब भी दिया चाँद बहते पानी में
लगा कि हुस्न तिरा आ गया रवानी में
उसे ख़बर ही नहीं शाम को जो होना है
ये आफ़्ताब अभी चूर है जवानी में
यूँही सँवरती नहीं हैं गुलों की तक़दीरें
लहू निचोड़ना पड़ता है बाग़बानी में
तमाम 'उम्र मैं उस को तलाश करता रहा
वो एक शख़्स जो था ही नहीं कहानी में
कभी किसी के न मेहमान हम हुए 'इन'आम'
तमाम 'उम्र गुज़ारी है मेज़बानी में
जिसे पढ़ा था बड़े शौक़ से कहानी में
दिखाई जब भी दिया चाँद बहते पानी में
लगा कि हुस्न तिरा आ गया रवानी में
उसे ख़बर ही नहीं शाम को जो होना है
ये आफ़्ताब अभी चूर है जवानी में
यूँही सँवरती नहीं हैं गुलों की तक़दीरें
लहू निचोड़ना पड़ता है बाग़बानी में
तमाम 'उम्र मैं उस को तलाश करता रहा
वो एक शख़्स जो था ही नहीं कहानी में
कभी किसी के न मेहमान हम हुए 'इन'आम'
तमाम 'उम्र गुज़ारी है मेज़बानी में
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