वो कीमिया से दाग़ मिरे पैरहन के थे

By sarahat-ahmad-sarahatJanuary 4, 2024
वो कीमिया से दाग़ मिरे पैरहन के थे
तारे हसीन जैसे किसी अंजुमन के थे
लटके रहे सलीब पे अपने ग़मों की हम
दो गज़ ज़मीन के थे न अपने कफ़न के थे


रो कर लहू हमीं ने खिलाए तमाम गुल
हम ऐसे बाग़बान के उजड़े चमन के थे
होगा न ए'तिबार किसी तौर फिर हमें
वो 'इश्क़ के फ़रेब सभी बाँकपन के थे


48483 viewsghazalHindi