वो शख़्स मेरे दिल से निकल ही नहीं रहा
By syed-masood-naqviJanuary 5, 2024
वो शख़्स मेरे दिल से निकल ही नहीं रहा
दिल है कि अपनी ज़िद से पिघल ही नहीं रहा
अब वक़्त का तमाशा तो खुल ही नहीं रहा
जिस कल में जी रहा था वो कल ही नहीं रहा
वो जीतना जो चाहे तो बाज़ी को जीत ले
लेकिन जो वसवसों से निकल ही नहीं रहा
चक्कर में पड़ गया है जो धोके से 'इश्क़ के
फिर उस की उलझनों से निकल ही नहीं रहा
घड़ियाँ बदल बदल के भी देखीं हैं सुब्ह शाम
कैसा ये वक़्त है जो बदल ही नहीं रहा
मंज़र दिखाऊँ और मैं 'इबरत के किस क़दर
इंसान है कि अब भी सँभल ही नहीं रहा
मस्जिद में बे-दिली से अज़ाँ दे रहा है कौन
शैतान कोई घर से निकल ही नहीं रहा
धोके से एक सिक्का जो खोटा निकल गया
अब क्या करूँ मैं इस का कि चल ही नहीं रहा
बाज़ी टिकी हुई है मिरी अगली चाल पर
तो जाओ फिर ये चाल मैं चल ही नहीं रहा
अब क्यों दिखा रहे हो ये मंज़िल का रास्ता
'मस’ऊद' तेरे साथ मैं चल ही नहीं रहा
दुश्मन के नाम के तो दिन आते ही ढल गए
'मस’ऊद' का ज़माना तो ढल ही नहीं रहा
दिल है कि अपनी ज़िद से पिघल ही नहीं रहा
अब वक़्त का तमाशा तो खुल ही नहीं रहा
जिस कल में जी रहा था वो कल ही नहीं रहा
वो जीतना जो चाहे तो बाज़ी को जीत ले
लेकिन जो वसवसों से निकल ही नहीं रहा
चक्कर में पड़ गया है जो धोके से 'इश्क़ के
फिर उस की उलझनों से निकल ही नहीं रहा
घड़ियाँ बदल बदल के भी देखीं हैं सुब्ह शाम
कैसा ये वक़्त है जो बदल ही नहीं रहा
मंज़र दिखाऊँ और मैं 'इबरत के किस क़दर
इंसान है कि अब भी सँभल ही नहीं रहा
मस्जिद में बे-दिली से अज़ाँ दे रहा है कौन
शैतान कोई घर से निकल ही नहीं रहा
धोके से एक सिक्का जो खोटा निकल गया
अब क्या करूँ मैं इस का कि चल ही नहीं रहा
बाज़ी टिकी हुई है मिरी अगली चाल पर
तो जाओ फिर ये चाल मैं चल ही नहीं रहा
अब क्यों दिखा रहे हो ये मंज़िल का रास्ता
'मस’ऊद' तेरे साथ मैं चल ही नहीं रहा
दुश्मन के नाम के तो दिन आते ही ढल गए
'मस’ऊद' का ज़माना तो ढल ही नहीं रहा
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