याद आती है बहुत यार तिरी शाम के बा'द
By siddharth-saini-saadOctober 4, 2023
याद आती है बहुत यार तिरी शाम के बा'द
इस लिए आँख में रहती है नमी शाम के बा'द
चाँद भी आसमाँ से उस को उतर कर देखे
घर से बाहर वो अगर निकले कभी शाम के बा'द
मैं तो उस पौदे को पानी भी नहीं देता कभी
कैसे खिल जाती है ये ग़म की कली शाम के बा'द
मेरे सीने से लिपट कर मिरे ग़म रोते हैं
दोस्त बन जाती है तन्हाई मिरी शाम के बा'द
चाँद बन के तू किसी रोज़ मिरे घर में आ
घर में होती है कमी रौशनी की शाम के बा'द
ज़ख़्म सब ताज़ा हुए तेरी जुदाई के कल
जब सुनी एक ग़ज़ल दर्द-भरी शाम के बा'द
वस्ल-ए-महबूब की उम्मीद में तेज़ी से चलें
धड़कनें और ये दीवार-घड़ी शाम के बा'द
कुछ भी तो ज़िंदगी में 'साद' नहीं बदला तिरी
सुब्ह जो होता है होता है वही शाम के बा'द
इस लिए आँख में रहती है नमी शाम के बा'द
चाँद भी आसमाँ से उस को उतर कर देखे
घर से बाहर वो अगर निकले कभी शाम के बा'द
मैं तो उस पौदे को पानी भी नहीं देता कभी
कैसे खिल जाती है ये ग़म की कली शाम के बा'द
मेरे सीने से लिपट कर मिरे ग़म रोते हैं
दोस्त बन जाती है तन्हाई मिरी शाम के बा'द
चाँद बन के तू किसी रोज़ मिरे घर में आ
घर में होती है कमी रौशनी की शाम के बा'द
ज़ख़्म सब ताज़ा हुए तेरी जुदाई के कल
जब सुनी एक ग़ज़ल दर्द-भरी शाम के बा'द
वस्ल-ए-महबूब की उम्मीद में तेज़ी से चलें
धड़कनें और ये दीवार-घड़ी शाम के बा'द
कुछ भी तो ज़िंदगी में 'साद' नहीं बदला तिरी
सुब्ह जो होता है होता है वही शाम के बा'द
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