ये एक दिन का नहीं तज्रबा है बरसों का

By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
ये एक दिन का नहीं तज्रबा है बरसों का
कभी समझ में न आया ख़िताब आँखों का
हुज़ूर आप भी तो इस क़दर ज़ियादा हैं
शुमार कौन करे कम-नज़र हरीफ़ों का


'अदावतें ही सही कुछ तो हो 'अयाँ हम पर
बहुत ही सख़्त है ये मरहला हिजाबों का
जो बात दिल में नहीं थी ज़बाँ पे आई है
गला न घोंट दे ये वक़्त अब दलीलों का


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