ये फ़ितरत है छुपी रहती है पहचानी नहीं जाती
By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
ये फ़ितरत है छुपी रहती है पहचानी नहीं जाती
जो बन जाती है 'आदत वो ब-आसानी नहीं जाती
हवादिस अच्छी-ख़ासी शख़्सियत को तोड़ देते हैं
बदल जाती है शक्ल ऐसी कि पहचानी नहीं जाती
अना को नाम दे देते हैं जो ख़ुद-ए'तिमादी का
वो मिट जाते हैं लेकिन उन की मन-मानी नहीं जाती
जवाँ नस्लों में जब कम-माएगी घर करने लगती है
ज़माने तक फिर उन की ये पशेमानी नहीं जाती
गुज़र जाते हैं अपनी जान से जो क़ौम की ख़ातिर
अकारत ऐसे जाँ-बाज़ों की क़ुर्बानी नहीं जाती
सहारा ग़ैर का लेने की कोशिश मत करो यारो
जो ख़ूगर इस का हो जाए तन-आसानी नहीं जाती
'वजाहत' इस क़दर खाए हैं धोके हम ने अपनों से
भुलाना लाख चाहें फिर भी हैरानी नहीं जाती
जो बन जाती है 'आदत वो ब-आसानी नहीं जाती
हवादिस अच्छी-ख़ासी शख़्सियत को तोड़ देते हैं
बदल जाती है शक्ल ऐसी कि पहचानी नहीं जाती
अना को नाम दे देते हैं जो ख़ुद-ए'तिमादी का
वो मिट जाते हैं लेकिन उन की मन-मानी नहीं जाती
जवाँ नस्लों में जब कम-माएगी घर करने लगती है
ज़माने तक फिर उन की ये पशेमानी नहीं जाती
गुज़र जाते हैं अपनी जान से जो क़ौम की ख़ातिर
अकारत ऐसे जाँ-बाज़ों की क़ुर्बानी नहीं जाती
सहारा ग़ैर का लेने की कोशिश मत करो यारो
जो ख़ूगर इस का हो जाए तन-आसानी नहीं जाती
'वजाहत' इस क़दर खाए हैं धोके हम ने अपनों से
भुलाना लाख चाहें फिर भी हैरानी नहीं जाती
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