ये हँसी-ख़ुशी का मौसम ये बहार का ज़माना

By kaleem-aajizJanuary 3, 2024
ये हँसी-ख़ुशी का मौसम ये बहार का ज़माना
तिरे वास्ते हक़ीक़त मिरे वास्ते फ़साना
न सँभल सकेगी तुझ से तिरी ज़ुल्फ़-ए-ता-ब-शाना
मैं अभी से देखता हूँ जो दिखाएगा ज़माना


जो तिरी ज़बाँ से निकला वही बन गया फ़साना
मिरे दिल की धड़कनों से रहा बे-ख़बर ज़माना
मिरी ख़ानुमाँ-ख़राबी का जहाँ में है फ़साना
ये वो हादिसा है जिस को न भुला सका ज़माना


मैं निगाह-ए-बाग़बाँ में कोई और हो गया हूँ
अभी चार दिन हुए हैं कि जला है आशियाना
तुझे ऐ ग़म-ए-मोहब्बत इधर आ गले लगा लूँ
न तिरा कहीं गुज़र है न मिरा कहीं ठिकाना


मैं हूँ वो ग़रीब 'आजिज़' कि गुलों की अंजुमन में
मिरे पैरहन के टुकड़ों का बना है शामियाना
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