ये हम हैं कि जौर-ओ-सितम देखते हैं

By munshi-khairati-laal-shaguftaJanuary 4, 2024
ये हम हैं कि जौर-ओ-सितम देखते हैं
सहर उठ के फिर ये क़दम देखते हैं
तिरा लुत्फ़ जब यार कम देखते हैं
तो दिल पर हुजूम-ए-अलम देखते हैं


तिरे रुख़ पे जब ज़ुल्फ़ हम देखते हैं
हम-आग़ोश शादी-ओ-ग़म देखते हैं
तुम्हारी निगाह-ए-लुत्फ़-आमेज़ को हम
ग़ज़ब है कि अब बेश-ओ-कम देखते हैं


उन्हीं की तरह बे-ग़रज़ बन गए हैं
जो वो देखते हैं तो हम देखते हैं
तसव्वुर में रुख़्सार-ओ-गेसू के पैहम
बहम कुफ्र-ओ-इस्लाम हम देखते हैं


तुम्हारा सू-ए-मज़रआ-ए-ग़ैर अक्सर
तरश्शोह पे अब्र-ए-करम देखते हैं
तिरे नाज़-ओ-अंदाज़ से ऐ सितमगर
सितम है सितम पर सितम देखते हैं


ठहर तू ज़रा जोश-ए-बेताबी-ए-दिल
अभी हम मिज़ाज-ए-सनम देखते हैं
लिखेंगे मिरे सीना-चाकी का मज़मूँ
वो हँस कर शिगाफ़-ए-क़लम देखते हैं


नहीं देखती गर हमें तुम तो देखो
तुम्हें तो मोहब्बत से हम देखते हैं
ख़ुदा पर है आईना ऐ आइना-रू
तुम्हें एक मुद्दत से हम देखते हैं


ख़ुदा आबरू जाँ-निसारों की रख ले
कि वो आब-ए-तेग़-ए-दो-दम देखते हैं
न माँगेंगे अब बोसा-ए-ज़ुल्फ़ तुम से
क़सम है तुम्हारी क़सम देखते हैं


समझते हैं सीपारा-ए-बख़्त आशिक़
जो तारा कोई सुब्ह-दम देखते हैं
शब-ए-वस्ल में ऐ 'शगुफ़्ता' ख़ुशी से
करम यार का दम-ब-दम देखते हैं


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