ये 'इश्क़-ओ-वफ़ा का सिला कुछ नहीं
By habib-rehmanJanuary 3, 2024
ये 'इश्क़-ओ-वफ़ा का सिला कुछ नहीं
कहा था किसी ने ख़ुदा कुछ नहीं
जो चाहा था तू ने किसी और को
मुझे यार तुझ से गिला कुछ नहीं
वो पतझड़ बहारों के मानिंद थी
बहारों में अब के खिला कुछ नहीं
मिरी एक ख़्वाहिश न पूरी हुई
ये लगने लगा है दु'आ कुछ नहीं
ज़रूरत उन्हें लौ की अब आ पड़ी
कहा करते थे जो दिया कुछ नहीं
ज़माने को खलने लगी है वफ़ा
तो 'रहमान' तुझ से बुरा कुछ नहीं
कहा था किसी ने ख़ुदा कुछ नहीं
जो चाहा था तू ने किसी और को
मुझे यार तुझ से गिला कुछ नहीं
वो पतझड़ बहारों के मानिंद थी
बहारों में अब के खिला कुछ नहीं
मिरी एक ख़्वाहिश न पूरी हुई
ये लगने लगा है दु'आ कुछ नहीं
ज़रूरत उन्हें लौ की अब आ पड़ी
कहा करते थे जो दिया कुछ नहीं
ज़माने को खलने लगी है वफ़ा
तो 'रहमान' तुझ से बुरा कुछ नहीं
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