ये मिरी ज़िद है कि मुझ को वो मनाने आए
By amir-masoodFebruary 5, 2024
ये मिरी ज़िद है कि मुझ को वो मनाने आए
साथ मेरे भी वो कुछ वक़्त बिताने आए
कब तलक आँखें खुलेंगी मिरी मोबाइल से
भीगी ज़ुल्फ़ों से वो मुझ को तो जगाने आए
बात महफ़िल में जो आई कभी दिलदारी की
दोस्त सारे वो मुझे याद पुराने आए
हाए अफ़सोस ये बारिश मिरी सौतन है बनी
धूप निकले तो वो कपड़ों को सुखाने आए
मय-कदों में तो बहुत पी है मगर अब 'आमिर'
है यही चाह कि मुझ को वो पिलाने आए
साथ मेरे भी वो कुछ वक़्त बिताने आए
कब तलक आँखें खुलेंगी मिरी मोबाइल से
भीगी ज़ुल्फ़ों से वो मुझ को तो जगाने आए
बात महफ़िल में जो आई कभी दिलदारी की
दोस्त सारे वो मुझे याद पुराने आए
हाए अफ़सोस ये बारिश मिरी सौतन है बनी
धूप निकले तो वो कपड़ों को सुखाने आए
मय-कदों में तो बहुत पी है मगर अब 'आमिर'
है यही चाह कि मुझ को वो पिलाने आए
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