ये सोचना भी ग़लत है कि दिल-नशीं है बहुत
By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
ये सोचना भी ग़लत है कि दिल-नशीं है बहुत
कमाल-ए-दुनिया तो इतना है बे-यक़ीं है बहुत
कहीं झुलस ही न जाए ग़ुबार यादों का
कि मेरे ख़ून की रफ़्तार आतिशीं है बहुत
गुमान होने लगा है ये किस के होने पर
कहीं कहीं जो नहीं है कहीं कहीं है बहुत
शिकस्त खाई है लेकिन शिकस्ता-पा तो नहीं
हमारे पाँव के नीचे अभी ज़मीं है बहुत
बिखेर दे न कहीं फिर मता’-ए-दीदा-ओ-दिल
वो एक ख़्वाब जो आँखों में जागुज़ीँ है बहुत
ज़रर-रिसाँ न हुआ कुछ मिरा ग़नीम मगर
किसे ख़बर थी कि मुझ को ये आस्तीं है बहुत
हमारा दिल भी दिखाता है नित-नए कर्तब
तुम्हारा दिल भी तो शायद तमाश-बीं है बहुत
कमाल-ए-दुनिया तो इतना है बे-यक़ीं है बहुत
कहीं झुलस ही न जाए ग़ुबार यादों का
कि मेरे ख़ून की रफ़्तार आतिशीं है बहुत
गुमान होने लगा है ये किस के होने पर
कहीं कहीं जो नहीं है कहीं कहीं है बहुत
शिकस्त खाई है लेकिन शिकस्ता-पा तो नहीं
हमारे पाँव के नीचे अभी ज़मीं है बहुत
बिखेर दे न कहीं फिर मता’-ए-दीदा-ओ-दिल
वो एक ख़्वाब जो आँखों में जागुज़ीँ है बहुत
ज़रर-रिसाँ न हुआ कुछ मिरा ग़नीम मगर
किसे ख़बर थी कि मुझ को ये आस्तीं है बहुत
हमारा दिल भी दिखाता है नित-नए कर्तब
तुम्हारा दिल भी तो शायद तमाश-बीं है बहुत
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