यूँ रूठ कर न जा कि तुझे कुछ ख़बर भी है
By bashir-farooqiJanuary 2, 2024
यूँ रूठ कर न जा कि तुझे कुछ ख़बर भी है
'उम्र-ए-जुनूँ दराज़ भी है मुख़्तसर भी है
वो आँख देख कर भी मुझे अजनबी सी है
इक़रार-ए-‘इश्क़ भी है ज़माने का डर भी है
ऐ ज़िंदगी कभी तो मुझे मुड़ के देख ले
इक शख़्स तेरा चाहने वाला इधर भी है
इस शहर-ए-क़ातिलाँ से हमें क्या नहीं मिला
सीने में दाग़-ए-‘इश्क़ भी है ज़ख़्म-ए-सर भी है
मायूस हो के कुछ न मिलेगा जहान में
जीना भी सीखिए कि ये जीना हुनर भी है
सूरज हिसार-ए-शब से निकल तो गया मगर
ख़ून-ए-शफ़क़ से जामा-ए-ख़ुश-रंग तर भी है
इतना तुझे ख़याल रहे ऐ अमीर-ए-शहर
ऊँची हवेलियों का मुक़द्दर खंडर भी है
पत्थर उठा के सोच रहा हूँ मैं ऐ 'बशीर'
इस शहर-ए-संग में मिरा शीशे का घर भी है
'उम्र-ए-जुनूँ दराज़ भी है मुख़्तसर भी है
वो आँख देख कर भी मुझे अजनबी सी है
इक़रार-ए-‘इश्क़ भी है ज़माने का डर भी है
ऐ ज़िंदगी कभी तो मुझे मुड़ के देख ले
इक शख़्स तेरा चाहने वाला इधर भी है
इस शहर-ए-क़ातिलाँ से हमें क्या नहीं मिला
सीने में दाग़-ए-‘इश्क़ भी है ज़ख़्म-ए-सर भी है
मायूस हो के कुछ न मिलेगा जहान में
जीना भी सीखिए कि ये जीना हुनर भी है
सूरज हिसार-ए-शब से निकल तो गया मगर
ख़ून-ए-शफ़क़ से जामा-ए-ख़ुश-रंग तर भी है
इतना तुझे ख़याल रहे ऐ अमीर-ए-शहर
ऊँची हवेलियों का मुक़द्दर खंडर भी है
पत्थर उठा के सोच रहा हूँ मैं ऐ 'बशीर'
इस शहर-ए-संग में मिरा शीशे का घर भी है
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