यूँ तो जहाँ-पनाह के मद्दाह कम न थे
By bashir-farooqiJanuary 2, 2024
यूँ तो जहाँ-पनाह के मद्दाह कम न थे
अच्छा हुआ ज़मीर-फ़रोशों में हम न थे
जो रंज मीर-ए-शहर को पहुँचा वो रंज था
जो ग़म किसी ग़रीब ने झेले वो ग़म न थे
आवाज़ दे रही थीं उन्हें मंज़िलें मगर
वो क्या क़दम बढ़ाते जो साबित-क़दम न थे
इक दौर वो था जब तह-ए-तेग़-ए-असर थे हम
यूँ हाथ में क़लम थे कि जैसे क़लम न थे
अपनी हदों में अपना उजाला रहा कि हम
दहलीज़ का दिया थे चराग़-ए-हरम न थे
फ़िक्र-ए-जहाँ ने तोड़ दिया वर्ना ऐ 'बशीर'
आईना-साज़ हम भी ज़माने में कम न थे
अच्छा हुआ ज़मीर-फ़रोशों में हम न थे
जो रंज मीर-ए-शहर को पहुँचा वो रंज था
जो ग़म किसी ग़रीब ने झेले वो ग़म न थे
आवाज़ दे रही थीं उन्हें मंज़िलें मगर
वो क्या क़दम बढ़ाते जो साबित-क़दम न थे
इक दौर वो था जब तह-ए-तेग़-ए-असर थे हम
यूँ हाथ में क़लम थे कि जैसे क़लम न थे
अपनी हदों में अपना उजाला रहा कि हम
दहलीज़ का दिया थे चराग़-ए-हरम न थे
फ़िक्र-ए-जहाँ ने तोड़ दिया वर्ना ऐ 'बशीर'
आईना-साज़ हम भी ज़माने में कम न थे
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