यूँही मिलते रहें हम तुम कोई वा'दा न करें

By bashir-farooqiJanuary 2, 2024
यूँही मिलते रहें हम तुम कोई वा'दा न करें
हम को जीना है तो ख़्वाबों पे भरोसा न करें
मैं भी इस दौर का इंसाँ हूँ फ़रिश्ता तो नहीं
आप इस तरह मिरी आँखों से उलझा न करें


फिर उधर जाएँ उसी शख़्स को देखें दुख हो
इस से बेहतर है कि उस राह से गुज़रा न करें
कौन जाने कि मुझे कब कहाँ जाना होगा
गर्दिशों से ये बता दो मिरा पीछा न करें


कुछ ख़यालात लुटेरे भी हुआ करते हैं
दिल के दरवाज़े खुले छोड़ के सोया न करें
अब ये अंदाज़-ए-बयाँ कोई न समझेगा 'बशीर'
'ग़ालिब'-ओ-'मीर' के अंदाज़ में सोचा न करें


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