ज़बाँ मजबूर है लब पर फ़ुग़ाँ है
By bashir-farooqJanuary 2, 2024
ज़बाँ मजबूर है लब पर फ़ुग़ाँ है
सरापा दर्द मेरी दास्ताँ है
निगाह-ए-यार भी है बद-गुमाँ सी
ग़ुरूर-ए-हुस्न भी दामन-कशाँ है
फ़िराक़-ए-दोस्त का क्या ज़िक्र आख़िर
विसाल-ए-यार भी दिल पर गिराँ है
जहाँ पर बात करना है क़यामत
वहाँ फ़रियाद की जुरअत कहाँ है
मिरा ग़म है मिरा सरमाया-ए-ज़ीस्त
मिरा हर अश्क मेरा तर्जुमाँ है
ख़ुमार-आलूदा नज़रों में है जो कैफ़
वो साक़ी तेरे साग़र में कहाँ है
अगर मय हुस्न है तो 'इश्क़ 'फ़ारूक़'
ख़ुमार-ए-बादा-ए-शो'ला-फ़िशाँ है
सरापा दर्द मेरी दास्ताँ है
निगाह-ए-यार भी है बद-गुमाँ सी
ग़ुरूर-ए-हुस्न भी दामन-कशाँ है
फ़िराक़-ए-दोस्त का क्या ज़िक्र आख़िर
विसाल-ए-यार भी दिल पर गिराँ है
जहाँ पर बात करना है क़यामत
वहाँ फ़रियाद की जुरअत कहाँ है
मिरा ग़म है मिरा सरमाया-ए-ज़ीस्त
मिरा हर अश्क मेरा तर्जुमाँ है
ख़ुमार-आलूदा नज़रों में है जो कैफ़
वो साक़ी तेरे साग़र में कहाँ है
अगर मय हुस्न है तो 'इश्क़ 'फ़ारूक़'
ख़ुमार-ए-बादा-ए-शो'ला-फ़िशाँ है
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