ज़ालिम को भी फिर नश्शा-ए-बेदाद-गरी है
By abdullah-saqibJanuary 6, 2024
ज़ालिम को भी फिर नश्शा-ए-बेदाद-गरी है
फिर हम हैं वही फिर वही आशुफ़्ता-सरी है
वो आए है जब याद तो लगता है कुछ ऐसा
जैसे कोई चट्टान सी सीने पे धरी है
ज़ाहिद ने उसे देखा जो टुक देख के बोला
आदम की ही बेटी है कि ये हूर परी है
महफ़िल में मुझे आप कहा उस गुल-ए-तर ने
अब आप है किस ज़ुमरे का ये दर्द-ए-सरी है
क्या हाल हुआ ख़्वाहिश-ए-यक-दीद में मेरा
आँखों में कोई अश्क भी बाक़ी न तरी है
ये सत्र लिखी आख़िरी और बंद कीं आँखें
क्या ख़ूब तिरी चारागरी चारागरी है
इस तरह से मिलता है अगर 'ओहदा-ओ-मंसब
क्या वक़'अत-ए-इम्लाक है क्या ताज-वरी है
फिर हम हैं वही फिर वही आशुफ़्ता-सरी है
वो आए है जब याद तो लगता है कुछ ऐसा
जैसे कोई चट्टान सी सीने पे धरी है
ज़ाहिद ने उसे देखा जो टुक देख के बोला
आदम की ही बेटी है कि ये हूर परी है
महफ़िल में मुझे आप कहा उस गुल-ए-तर ने
अब आप है किस ज़ुमरे का ये दर्द-ए-सरी है
क्या हाल हुआ ख़्वाहिश-ए-यक-दीद में मेरा
आँखों में कोई अश्क भी बाक़ी न तरी है
ये सत्र लिखी आख़िरी और बंद कीं आँखें
क्या ख़ूब तिरी चारागरी चारागरी है
इस तरह से मिलता है अगर 'ओहदा-ओ-मंसब
क्या वक़'अत-ए-इम्लाक है क्या ताज-वरी है
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