ज़लज़लों का असर नहीं होता

By fahmi-badayuniFebruary 6, 2024
ज़लज़लों का असर नहीं होता
घर इधर से उधर नहीं होता
सिर्फ़ शो'लों की दाद मिलती है
क्या सुलगना हुनर नहीं होता


रेल गाड़ी से कूद जाऊँ क्या
अब अकेले सफ़र नहीं होता
'इश्क़ उस फ़ैसले को कहते हैं
जो कभी सोच कर नहीं होता


क़ब्र में रोज़-ए-हश्र से पहले
ज़िंदा होने का डर नहीं होता
सब करिश्मा है शे'र होने का
शे'र कहना हुनर नहीं होता


मैं ही ज़ख़्मों को छेड़ देता हूँ
जब कोई चारागर नहीं होता
जिस के क़ब्ज़े में दुनिया होती है
उस का दुनिया में घर नहीं होता


24495 viewsghazalHindi