ज़माना बीत चुका है पलक भिगोने का
By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
ज़माना बीत चुका है पलक भिगोने का
यूँ जी रहे हैं कि मौक़ा नहीं है रोने का
ज़मीं भी नर्म है बादल भी सा’इक़ा-बर-दोश
यही तो वक़्त मुनासिब है बीज बोने का
ये मा-हसल भी हमें हब्स-ए-जाँ बना हुआ है
कि इब्तिदा ही से खटका लगा था खोने का
थके-थकाए तिरे बाज़ुओं में सोते हैं
हमें पता है मज़ा रेशमी बिछौने का
'अजीब अपनी तबी'अत है इन दिनों 'अंजुम'
बहाना ढूँड रही है उदास होने का
यूँ जी रहे हैं कि मौक़ा नहीं है रोने का
ज़मीं भी नर्म है बादल भी सा’इक़ा-बर-दोश
यही तो वक़्त मुनासिब है बीज बोने का
ये मा-हसल भी हमें हब्स-ए-जाँ बना हुआ है
कि इब्तिदा ही से खटका लगा था खोने का
थके-थकाए तिरे बाज़ुओं में सोते हैं
हमें पता है मज़ा रेशमी बिछौने का
'अजीब अपनी तबी'अत है इन दिनों 'अंजुम'
बहाना ढूँड रही है उदास होने का
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