ज़मीन थी ही नहीं आसमान था ही नहीं

By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
ज़मीन थी ही नहीं आसमान था ही नहीं
जहाँ पे हम थे कोई दरमियान था ही नहीं
सुख़न तो वर्ना दिलों को भी चीर देता है
तिरे बयान में ज़ोर-ए-बयान था ही नहीं


हसीन लोग उड़ा ले गए ख़ज़ाना-ए-दिल
ये घर खुला था कोई पासबान था ही नहीं
उसे भी रोग नए मौसमों का लग गया है
हवा के रुख़ पे हमारा भी ध्यान था ही नहीं


ये कौन कश्ती मिरी साहिलों पे ले आया
हवा थी तेज़ बहुत बादबान था ही नहीं
नसब का जज़्ब-ए-तफ़ाख़ुर था ढेर मिट्टी का
पता चला कि मिरा ख़ानदान था ही नहीं


57466 viewsghazalHindi