ज़िक्र-ए-वफ़ा कब एक फ़साना है आज-कल
By raft-bahraichiJanuary 4, 2024
ज़िक्र-ए-वफ़ा कब एक फ़साना है आज-कल
मर के नहीं तो जी के दिखाना है आज-कल
जिस दिल को देखो इन का निशाना है आज-कल
जैसे इन्हीं बुतों का ज़माना है आज-कल
किस की ज़बाँ पे ज़िक्र मिरे 'इश्क़ का नहीं
देखो न एक लफ़्ज़ फ़साना है आज-कल
मुझ को मिटा के इस तरह से मुतमइन वो हैं
जैसे सवाब ज़ुल्म का ढाना है आज-कल
मरना दलील-ए-अम्न है तकमील-ए-अम्न है
जीना मिरी नज़र में बहाना है आज-कल
मुझ को सता के देख ले ऐ ना-सिपास वक़्त
मेरे लिए मलाल तराना है आज-कल
ज़ुल्फ़ों के बल निकाल न दे तो सही हुज़ूर
हर-चंद दस्त-ए-नाज़्नीं शाना है आज-कल
तुझ को हँसी न आएगी तो किस को आएगी
ऐ इंक़िलाब तेरा ज़माना है आज-कल
हम और दिल की बात कहें तौबा कीजिए
ख़ुद जुम्बिश-ए-निगाह फ़साना है आज-कल
'राफ़त' हमीं को ख़ुद नहीं इस्लाह की तमीज़
क्यों कहिए कजरवी पे ज़माना है आज-कल
मर के नहीं तो जी के दिखाना है आज-कल
जिस दिल को देखो इन का निशाना है आज-कल
जैसे इन्हीं बुतों का ज़माना है आज-कल
किस की ज़बाँ पे ज़िक्र मिरे 'इश्क़ का नहीं
देखो न एक लफ़्ज़ फ़साना है आज-कल
मुझ को मिटा के इस तरह से मुतमइन वो हैं
जैसे सवाब ज़ुल्म का ढाना है आज-कल
मरना दलील-ए-अम्न है तकमील-ए-अम्न है
जीना मिरी नज़र में बहाना है आज-कल
मुझ को सता के देख ले ऐ ना-सिपास वक़्त
मेरे लिए मलाल तराना है आज-कल
ज़ुल्फ़ों के बल निकाल न दे तो सही हुज़ूर
हर-चंद दस्त-ए-नाज़्नीं शाना है आज-कल
तुझ को हँसी न आएगी तो किस को आएगी
ऐ इंक़िलाब तेरा ज़माना है आज-कल
हम और दिल की बात कहें तौबा कीजिए
ख़ुद जुम्बिश-ए-निगाह फ़साना है आज-कल
'राफ़त' हमीं को ख़ुद नहीं इस्लाह की तमीज़
क्यों कहिए कजरवी पे ज़माना है आज-कल
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