ज़िक्र क्यूँ-कर न करूँ आप के रुख़्सारों का

By raft-bahraichiJanuary 4, 2024
ज़िक्र क्यूँ-कर न करूँ आप के रुख़्सारों का
हूँ मैं हाफ़िज़ इसी क़ुरआन के दो पारों का
ले चली रहमत-ए-हक़ नाज़ से जब जानिब-ए-ख़ुल्द
देखा मुँह यास से दोज़ख़ ने गुनहगारों का


ये रह-ए-'इश्क़ है याँ नाज़ न कर ऐ ज़ाहिद
काफ़िरों का वही रुत्बा है जो दीं-दारों का
जल्द से जल्द पिला जाम पे जाम ऐ साक़ी
मुँह तक आया है कलेजा तिरे मय-ख़्वारों का


जीते जी लाख बचे लाख सुबुक-दोश रहे
मर के एहसान उठाना ही पड़ा यारों का
झुक के भर देता है हर एक का ख़ाली साग़र
शीशा करता है अदब दौर में मय-ख़्वारों का


लुत्फ़ 'उश्शाक़ को कूचे में तिरे ख़ुल्द का है
साया-ए-तूबा है साया तिरी दीवारों का
अपने मुँह देख लिया करते हैं बिस्मिल क़ातिल
आइना बन गया जौहर तिरी दीवारों का


मय-परस्ती न गई 'राफ़त'-ए-मेहराब-नशीं
हाए इस शक्ल पे ये काम सियह-कारों का
68994 viewsghazalHindi