ज़िंदा रहने को भी लाज़िम है सहारा कोई
By asima-farazJanuary 2, 2024
ज़िंदा रहने को भी लाज़िम है सहारा कोई
काश मिल जाए ग़म-ए-हिज्र का मारा कोई
है तिरी ज़ात से मुझ को वही निस्बत जैसे
चाँद के साथ चमकता हो सितारा कोई
ये मोहब्बत तो किसी पार न लगने देगी
ये वो दरिया है नहीं जिस का किनारा कोई
कैसे जानोगे कि रातों का तड़पना क्या है
तुम से बिछड़ा जो नहीं जान से प्यारा कोई
हम मोहब्बत में भी क़ाइल रहे यकताई के
हम ने रक्खा ही नहीं दिल में दुबारा कोई
सोचती हूँ तिरे पहलू में जो बैठा होगा
कैसा होगा वो परी-वश वो तुम्हारा कोई
कौन बाँटेगा मिरे साथ मिरी तन्हाई
ढूँड के ला दो मुझे ज़ीस्त से हारा कोई
काश मिल जाए ग़म-ए-हिज्र का मारा कोई
है तिरी ज़ात से मुझ को वही निस्बत जैसे
चाँद के साथ चमकता हो सितारा कोई
ये मोहब्बत तो किसी पार न लगने देगी
ये वो दरिया है नहीं जिस का किनारा कोई
कैसे जानोगे कि रातों का तड़पना क्या है
तुम से बिछड़ा जो नहीं जान से प्यारा कोई
हम मोहब्बत में भी क़ाइल रहे यकताई के
हम ने रक्खा ही नहीं दिल में दुबारा कोई
सोचती हूँ तिरे पहलू में जो बैठा होगा
कैसा होगा वो परी-वश वो तुम्हारा कोई
कौन बाँटेगा मिरे साथ मिरी तन्हाई
ढूँड के ला दो मुझे ज़ीस्त से हारा कोई
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