ज़िंदगी इक जाल में उलझी हुई है आज भी
By balbir-rathiJanuary 2, 2024
ज़िंदगी इक जाल में उलझी हुई है आज भी
बेबसी पहले जो थी वो बेबसी है आज भी
आज भी सहमी हुई है हर तरफ़ इंसानियत
आदमी की कोशिशों में कुछ कमी है आज भी
ऐ दिल-ए-मा'सूम तेरी आरज़ूओं के तुफ़ैल
बे-सबब बे-मुद्द’आ दीवानगी है आज भी
मेरी मंज़िल के निशाँ तक मिट चुके मुद्दत हुई
किस लिए ऐ दिल वही आवारगी है आज भी
एक मुद्दत हो गई वो हादिसा गुज़रे हुए
हौसलों पर किस लिए बेचारगी है आज भी
ज़िंदगी क्यों ख़ुश्क है बे-कैफ़ है बे-रंग है
कुछ न कुछ तो बात है जिस की कमी है आज भी
बेबसी पहले जो थी वो बेबसी है आज भी
आज भी सहमी हुई है हर तरफ़ इंसानियत
आदमी की कोशिशों में कुछ कमी है आज भी
ऐ दिल-ए-मा'सूम तेरी आरज़ूओं के तुफ़ैल
बे-सबब बे-मुद्द’आ दीवानगी है आज भी
मेरी मंज़िल के निशाँ तक मिट चुके मुद्दत हुई
किस लिए ऐ दिल वही आवारगी है आज भी
एक मुद्दत हो गई वो हादिसा गुज़रे हुए
हौसलों पर किस लिए बेचारगी है आज भी
ज़िंदगी क्यों ख़ुश्क है बे-कैफ़ है बे-रंग है
कुछ न कुछ तो बात है जिस की कमी है आज भी
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