ज़ुल्म साले ने किया ये दिल-ए-दिल-गीर के साथ
By boom-merathiJanuary 20, 2024
ज़ुल्म साले ने किया ये दिल-ए-दिल-गीर के साथ
रख दिया बाँध के छप्पर में उसे तीर के साथ
ग़ैर को करके रिहा यार भी तदबीर के साथ
दे दिया संखिया थोड़ा सा उसे खीर के साथ
मुरशिदी जान का मुँह जिस ने किया था काला
आज भागी है मिरा दिन भी उसी पीर के साथ
वस्ल का नीम-मज़ा हो गया हासिल मुझ को
रात भर सोया लिपट कर तिरी तस्वीर के साथ
की मुक़द्दर की शिकायत तो हरामी ने कहा
तेरी तक़दीर का लिक्खा तिरी तक़दीर के साथ
इस तरह फिरता हूँ उस शोख़ के पीछे पीछे
जैसे इतवार लगा रहता है हर पीर के साथ
ले के उस शोख़ को आराम से छत पर सोया
ग़ैर को डाल दिया बाँध के शहतीर के साथ
फिर तो हासिल हो मज़ा वस्ल का दूना मुझ को
अक़्द हो जाए अगर यार की हम-शीर के साथ
कम-सिनी ही में हुआ शौक़-ए-असीरी पैदा
बरसों खेला हूँ मैं दरवाज़े की ज़ंजीर के साथ
इस तरह जुम्बिशें दे दे के निकाला उस को
आ गया दिल भी मिरा खींच के तिरे तीर के साथ
'बूम' साहब का यही मश्ग़ला है आहट पर
दिल को बहलाता है हर दम तिरी तस्वीर के साथ
रख दिया बाँध के छप्पर में उसे तीर के साथ
ग़ैर को करके रिहा यार भी तदबीर के साथ
दे दिया संखिया थोड़ा सा उसे खीर के साथ
मुरशिदी जान का मुँह जिस ने किया था काला
आज भागी है मिरा दिन भी उसी पीर के साथ
वस्ल का नीम-मज़ा हो गया हासिल मुझ को
रात भर सोया लिपट कर तिरी तस्वीर के साथ
की मुक़द्दर की शिकायत तो हरामी ने कहा
तेरी तक़दीर का लिक्खा तिरी तक़दीर के साथ
इस तरह फिरता हूँ उस शोख़ के पीछे पीछे
जैसे इतवार लगा रहता है हर पीर के साथ
ले के उस शोख़ को आराम से छत पर सोया
ग़ैर को डाल दिया बाँध के शहतीर के साथ
फिर तो हासिल हो मज़ा वस्ल का दूना मुझ को
अक़्द हो जाए अगर यार की हम-शीर के साथ
कम-सिनी ही में हुआ शौक़-ए-असीरी पैदा
बरसों खेला हूँ मैं दरवाज़े की ज़ंजीर के साथ
इस तरह जुम्बिशें दे दे के निकाला उस को
आ गया दिल भी मिरा खींच के तिरे तीर के साथ
'बूम' साहब का यही मश्ग़ला है आहट पर
दिल को बहलाता है हर दम तिरी तस्वीर के साथ
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