‘उबूर कर वादी-ए-तज़ब्ज़ुब फ़राज़ की रहगुज़र से पहले
By sarfaraz-bazmiJanuary 4, 2024
‘उबूर कर वादी-ए-तज़ब्ज़ुब फ़राज़ की रहगुज़र से पहले
मता'-ए-‘अज़्म-ओ-यक़ीं है वाजिब सफ़र में रख़्त-ए-सफ़र से पहले
ये माह-ओ-अंजुम सरा सुरय्या चमन बयाबाँ ख़िज़ाँ बहाराँ
हैं सब हक़ीक़त में बे-हक़ीक़त हक़ीक़त-ए-मुंतज़र से पहले
कहाँ थे ये राह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल कहाँ थे दार-ओ-रसन सलासिल
था कौन मक़्तल में सर-कशीदा तुम्हारे शोरीदा-सर से पहले
खनक रही है अभी तो पायल बरस रहे हैं अभी तो बादल
ये क्या कि बहने लगा है काजल हुजूम-ए-बर्क़-ओ-शरर से पहले
मिला जो मौक़ा' तो हम-सफ़ीरो मैं अपनी रूदाद यूँ कहूँगा
कि रो पड़ेगी फ़ज़ा-ए-महमिल हुज़ूर में चश्म-ए-तर से पहले
है ‘आरिज़-ए-गुल पे अश्क-ए-शबनम कली की पलकें झुकी झुकी हैं
वो ऐसे बैठे हुए हैं जैसे चमन नसीम-ए-सहर से पहले
उफ़ुक़ पे आँधी चढ़ी हुई है भँवर की हिम्मत बढ़ी हुई है
भँवर को शायद पता नहीं है जुनूँ भँवर है भँवर से पहले
ये सुब्ह-ए-काज़िब है सरफ़रोशो अभी अंधेरा मिटा नहीं है
न चैन ज़ुल्मत को लेने देना तुलू'-ए-नूर-ए-सहर से पहले
निसार 'बज़्मी' ग़ुरूर उस का बस एक सज्दा क़ुसूर उस का
जो 'अर्श वालों में मो'तबर था शु’ऊर-ए-ना-मो'तबर से पहले
मता'-ए-‘अज़्म-ओ-यक़ीं है वाजिब सफ़र में रख़्त-ए-सफ़र से पहले
ये माह-ओ-अंजुम सरा सुरय्या चमन बयाबाँ ख़िज़ाँ बहाराँ
हैं सब हक़ीक़त में बे-हक़ीक़त हक़ीक़त-ए-मुंतज़र से पहले
कहाँ थे ये राह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल कहाँ थे दार-ओ-रसन सलासिल
था कौन मक़्तल में सर-कशीदा तुम्हारे शोरीदा-सर से पहले
खनक रही है अभी तो पायल बरस रहे हैं अभी तो बादल
ये क्या कि बहने लगा है काजल हुजूम-ए-बर्क़-ओ-शरर से पहले
मिला जो मौक़ा' तो हम-सफ़ीरो मैं अपनी रूदाद यूँ कहूँगा
कि रो पड़ेगी फ़ज़ा-ए-महमिल हुज़ूर में चश्म-ए-तर से पहले
है ‘आरिज़-ए-गुल पे अश्क-ए-शबनम कली की पलकें झुकी झुकी हैं
वो ऐसे बैठे हुए हैं जैसे चमन नसीम-ए-सहर से पहले
उफ़ुक़ पे आँधी चढ़ी हुई है भँवर की हिम्मत बढ़ी हुई है
भँवर को शायद पता नहीं है जुनूँ भँवर है भँवर से पहले
ये सुब्ह-ए-काज़िब है सरफ़रोशो अभी अंधेरा मिटा नहीं है
न चैन ज़ुल्मत को लेने देना तुलू'-ए-नूर-ए-सहर से पहले
निसार 'बज़्मी' ग़ुरूर उस का बस एक सज्दा क़ुसूर उस का
जो 'अर्श वालों में मो'तबर था शु’ऊर-ए-ना-मो'तबर से पहले
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