आख़िर क्यों

By baqar-naqviJanuary 2, 2024
मेरे लॉन की घास
रोज़ रात में बढ़ जाती है
रात में ही हर घास भला क्यों बढ़ती है
क्या सूरज से डरती है


मेरी मुंडेर की सब्ज़ चँबेली
काँटों-भरी दीवार पे
अँधियारे में सीढ़ी सीढ़ी चढ़ती है
रात में बेल भला क्यों चढ़ती है


क्या सूरज से डरती है
मेरे घर पर ओस की बरखा
शाम ढले से चुपके चुपके बरसती है
फूल-पात में बस्ती है


रात में ओस भला क्यों पड़ती है
क्या सूरज से डरती है
सूरज से हम सब डरते हैं
आख़िर क्यों


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