आँखें
By ahmad-ayazFebruary 24, 2025
सुनो जाना
मुझे इक बात कहनी थी
ये जो आँखें तुम्हारी हैं
बहुत ही ख़ूबसूरत हैं
न जाने क्यों मगर मुझ को
यही महसूस होता है
की इन ख़्वाबीदा आँखों में
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी हैं
जो अब तक किसी
अंजाम तक पहुँची नहीं हैं
और सारे ख़्वाब इक महवर पे गर्दिश कर रहे हैं
न जाने कौन सा वो वक़्त होगा जब
ठहर जाएगा ये लम्हा
और ये आँखें खुली रह जाएँगी
वो सारे ख़्वाब सारी ख़्वाहिशें बस देखते ही देखते
दम तोड़ देंगी इन हसीं ख़ुश-फ़हम आँखों में
मगर क्या ख़ूब हो तुम भी
मैं जब भी देखता हूँ ग़ौर से इन कत्थई आँखों में
यूँ महसूस होता है
कि जैसे घूरती रहती हों मुझ को
और मुझ से कह रही हों कि
मेरी आँखें ये तुम रख लो
तुम्हारे ख़्वाब मैं रख लूँ
मुझे इक बात कहनी थी
ये जो आँखें तुम्हारी हैं
बहुत ही ख़ूबसूरत हैं
न जाने क्यों मगर मुझ को
यही महसूस होता है
की इन ख़्वाबीदा आँखों में
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी हैं
जो अब तक किसी
अंजाम तक पहुँची नहीं हैं
और सारे ख़्वाब इक महवर पे गर्दिश कर रहे हैं
न जाने कौन सा वो वक़्त होगा जब
ठहर जाएगा ये लम्हा
और ये आँखें खुली रह जाएँगी
वो सारे ख़्वाब सारी ख़्वाहिशें बस देखते ही देखते
दम तोड़ देंगी इन हसीं ख़ुश-फ़हम आँखों में
मगर क्या ख़ूब हो तुम भी
मैं जब भी देखता हूँ ग़ौर से इन कत्थई आँखों में
यूँ महसूस होता है
कि जैसे घूरती रहती हों मुझ को
और मुझ से कह रही हों कि
मेरी आँखें ये तुम रख लो
तुम्हारे ख़्वाब मैं रख लूँ
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